Friday, April 29, 2016

रोहित से कन्हैया तक, और नरेंद मोदी की बदनामी तक

आज मुझे छह वर्षों से अधिक हो गए हैं डॉ. भीमराव अम्बेडकर के विचारों का प्रचार प्रसार करते हुए और बहुजन राजनीती या कहें कि मूवमेंट से जुड़े हुए। इन वर्षों में मैंने बहुत से अम्बेडकरवादियों को देखा। भारत से ले कर विदेशों तक के। परन्तु कन्हैया नाम के किसी अम्बेडकरवादी छात्र को न ही तो असल में या इंटरनेट पर ही देखा। जे एन यू में भी अम्बेडकरवादी मित्र रहे, वहां की दलित, आदिवासी और ओबीसी छात्र संस्थान बा प सा के मित्रों से भी मुलाकात की।  इनमें से बहुतों से फोन या नेट पर भी बात की पर कन्हैया कहीं नज़र नहीं आया। 

कम-से-कम बहुत से ऐसे अम्बेडकरवादियों को तो जानता हूँ कि जिन्होंने इंटरनेट पर और असल ज़िन्दगी में डॉ अम्बेडकर के विचारों का प्रचार प्रसार करने में दिन रात लगा दिए। ऐसे कई अनगिनत नाम हैं जिनका हिन्दू मीडिया में जिक्र तक नहीं होता। ऐसे ही अनगिनत लोग बहुजन समाज पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया आदि के हैं। बहुत से सरकारी कर्मचारी भी डॉ अम्बेडकर के विचारों के प्रचार प्रसार और पिछड़े वर्गों को न्याय दिलाने के कार्यक्रमों में लगे हैं परन्तु इन सभी में मुझे कोई कन्हैया नज़र नहीं आया। 

रोहित वेमुला के साथ जो हुआ उस बात का कन्हैया से क्या सम्बन्ध (लिंक) था ? जे एन यू का मुद्दा उछला था कश्मीरियों द्वारा भारत विरोधी नारों के साथ।  उस सब में जब कन्हैया का नाम आया तो वह जय भीम, जय भीम चिल्लाने लगा। मीडिया ने उसे क्रन्तिकारी भगत सिंह से ले कर अम्बेडकरवादी तक बना दिया और तो और उसे दलित राजनीती से भी जोड़ दिया। कन्हैया की जात क्या है यह किसी ने बताई नहीं। मैंने सुना कि वह भूमिहार ब्राह्मण है, वही बिहार के भूमिहार ब्राह्मण जो वर्षों से दलितों का कत्लेआम करते आए हैं। कन्हैया गरीब है, किसान का पुत्र  है, जैसी बातों से उसके प्रति संवेदना जगाई गई। जब पुलिस केस बना तो वही कन्हैया उसी कांग्रेस की गोद में चला गया जिस कांग्रेस के राज में कई दलित छात्र खुदखुशी कर चुके थे और तब कांग्रेस के भावी महाराज राहुल गांधी के मुंह से उफ्फ तक नहीं निकली थी।

इस सब प्रकरण में दलित भी कन्हैया के जय भीम और रोहित वेमुला को शहीद बनाने में लग गए। मुझे रोहित की मौत पर दुःख है, पर मैं पूछता हूँ कि वह अम्बेडकरवादी जो वर्षों से दिन रात डॉ अम्बेडकर के सपनों को साकार करने में लगे हैं, क्या उनके कार्य रोहित के कार्यों से कम हैं। ऐसे अम्बेडकरवादी जो नौकरी भी करते हैं और बाबा साहेब के काम भी करते हैं, क्या उनका सहयोग कम है? क्या आज भी ऐसे लाखों दलित बच्चे नहीं हैं जो स्कूल तक नहीं देख पाते, तो उनके जीवन को सुधारने के लिए मरना जरुरी है या और सुधारवादी कार्यों को करना ?

मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि रोहित की मौत पर जम कर राजनीती हुई है और हो रही है। किसी को अपनी राजनैतिक पार्टी को उठाना है, किसी को संगठन को चमकाना है , किसी को रोहित ने नाम पर कार्यक्रम करके चन्दा एकत्र करना है और किसी को रोहित का नाम ले कर खुद को पुलिस से बचाना है। 

इस सब में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को भी बहुत अपमानित और बदनाम किया गया। पर मैं पूछता हूँ कि आज तक कोई प्रधान मंत्री, और वह भी इतने बड़े बहुमत से निर्वाचित, एक शक्तिशाली प्रधान मंत्री हुआ है जिसने बाबा साहेब  डॉ. अम्बेडकर और भगवान् बुद्ध का इतना प्रचार किया हो? जिन नरेंद्र मोदी को उनके शत्रु हिन्दुओं के एक क्रूर शासक के रूप में स्थापित करना चाहते थे उन्ही नरेंद्र ने विश्व में भगवान् बुद्ध का नाम ले कर विश्व से यह आव्हान किया, विश्व को एक सन्देश दिया, कि भारत भगवान् बुद्ध का देश है। नरेंद्र मोदी के इस साहसी कदम को देखते हुए ब्राह्मणवाद इतना बौखलाया कि शंकराचार्य तक उनके विरोध में आ गए। चाहे अमेरिका की संसद में बाबा साहेब के योगदान को याद दिलाने की बात हो, अथवा संसद में संविधान दिवस मनाने की शुरुआत करने की, नरेंद्र मोदी ने हर वह कार्य किया है जिससे बाबा साहेब की गरिमा और भगवान् बुद्ध की ख्याति में वृद्धि ही हुई है। ऐसे में कन्हैया जैसा एक व्यक्ति जो खुद को अम्बेडकरवादी बताए और फिर राहुल गांधी की गोद में बैठ कर नरेंद्र मोदी को बदनाम करे, इससे यही नज़र आता है कि डॉ अम्बेडकर का नाम सिर्फ उन्हीं नरेंद्र को बदनाम करने के लिए लिया जा रहा है जिन्होंने एक प्रधानमंत्री के रूप में डॉ अम्बेडकर और भगवान् बुद्ध की ख्याति के लिए वह कार्य किए जो किसी प्रधानमन्त्री ने नहीं किए। 

मेरा यह लेख लिखने का मकसद है कि मैं अम्बेडकरवादियों को और समस्त भारतवासियों को यह बताऊँ कि जय भीम करनेवाला कन्हैया कितना अम्बेडकरवादी है, इस पर गौर करे और अम्बेडकरवादियों को जे एन यू की घटना से न जोडें। आज देश में लोग समझ रहे हैं कि कन्हैया दलित (अनुसूचित जाती का) है। लोग अम्बेडकरवादियों को कन्हैया से जोड़ रहे हैं। पर मैं यह स्पष्ट कर दूँ, और मैं जानता हूँ अम्बेडकरवादियों को, कि वह कश्मीर के विभाजन के पक्षधर नहीं हैं और न ही कन्हैया को उनसे कोई लेनादेना है। जहां तक अम्बेडकरवादियों और बौद्धों की बात है तो वह जानते हैं कि किस प्रकार इस्लाम का नाम लेकर मलेशिया से ले कर ताज़िकिस्तान तक बौद्धों का क़त्ल किया गया और एक बड़ा क्षेत्र इस्लाम के घेरे में आ गया।

मेरी किसी कन्हैया से कोई दुश्मनी नहीं है। वह कुछ भी करने के लिए स्वतन्त्र है, पर जय भीम कहना है तो डॉ. अम्बेडकर के विचारों पर काम करे। आलोचना करे उस कांग्रेस की जिसके राज में कई दलित छात्रों ने खुदखुशी की। आलोचना करे इस्लाम के नाम पर आतंकवादी संगठनों को चलाने वालों की और कश्मीरी अलगाववादियों की। आलोचना करे नितीश की, जिसके राज में दलितों पर अत्याचार हो रहे हैं। और अम्बेडकरवादियों की तरह वर्षों दिन रात काम करे। ध्यान रहे कि असली अम्बेडकरवादी चुपचाप अपने कार्य करते हैं और यदि आज भारत सरकार और अन्य कई सरकारों ने डॉ अम्बेडकर की 125 वीं जयन्ती इतनी धूमधाम से मनाई है तो यह उन अनगिनत अम्बेडकरवादियों के दिन रात के कार्यों की वजह से ही है जो चुपचाप अपना कार्य करते हैं। और अंततः मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूँ, कि यदि कन्हैया दलित होता तो उसे हिन्दू मीडिया द्वारा इतनी पब्लिसिटी नहीं मिलती जितनी कि मिली है। उसे पब्लिसिटी देने का मकसद अम्बेडकरवादियों को बदनाम करना, बहुजन राजनीती में विभाजन, नरेंद्र मोदी को बदनाम करना और दलितों को एक ऐसे नए नेता की तरफ आकर्षित करना मानो कि वह कोई अवतार हो जैसे अरविन्द केजरीवाल को एक अवतार, एक आइडियल बना दिया गया। मेरा यह लेख लिखने का उद्देश्य नरेंद्र मोदी अथवा बी जे पी का राजनैतिक पक्ष लेना भी नहीं है, क्योंकि मैं वैचारिक तौर पर बहुजन समाज पार्टी का समर्थक हूँ और मायावती जी को ही भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखता हूँ। 

- जय भीम, निखिल सबलानिया, दिल्ली 




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